हर कदम पे इक गुनाह करता हूँ,

आपके दिल की चाह रखता हूँ,

आप कहते हैं जिसे गुस्ताखी:O
मैं उसी को तो प्यार कहता हूँ।

हर कदम पे इक गुनाह करता हूँ,

तुम्हारी guestbook pe इक sign करता हूँ,

आप कहते हैं जिसे गुस्ताखी:O
मैं तो तुम्ही से इकरार करता हूँ।

हर कदम पे इक गुनाह करता हूँ,

आज मैं अपने दिल की बात कहता हूँ,

आप कहते हैं जिसे गुस्ताखी:O
मैं बस आप ही पे मरता हूँ।

हर कदम पे इक गुनाह करता हूँ,

तेरे नाम का जिक्र अपने गजलों करता हूँ,

आप कहते हैं जिसे गुस्ताखी:O
मैं ये जुर्म हर बार कहता हूँ।

बस यही गुनाह मैं इक बार करता हूँ
कि मैं तुझसे बेइंतेहा प्यार करता हूँ।

------------प्रदीप सिंह (PyAaRe88)